नई दिल्ली। भारत इस समय भीषण गर्मी और लू की चपेट में है। देश के कई हिस्सों में तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं। इसी बीच वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि प्रशांत महासागर में तेजी से बन रहा “सुपर अल नीनो” आने वाले महीनों में भारत समेत दुनिया के कई देशों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति और मजबूत हुई, तो 1877 जैसी ऐतिहासिक जलवायु आपदा का रिकॉर्ड भी टूट सकता है।
Highlights
- भारत के कई हिस्सों में तापमान 48°C के करीब पहुंचा
- वैज्ञानिकों ने “सुपर अल नीनो” को लेकर चेतावनी दी
- मानसून कमजोर होने और सूखे का खतरा बढ़ा
- कुछ राज्यों में बाढ़ और अत्यधिक बारिश की आशंका
- NOAA ने 2026 में अल नीनो बनने की 82% संभावना जताई
- समुद्र का तापमान 3°C तक बढ़ने का अनुमान
- किसानों और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है बड़ा असर
भारत में बढ़ती गर्मी ने बढ़ाई चिंता
देश के अधिकांश हिस्सों में इस समय भीषण गर्मी का प्रकोप जारी है। दिल्ली-एनसीआर में पारा 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है। Ahmedabad और Nagpur जैसे शहरों में तापमान 41 से 43 डिग्री सेल्सियस के बीच दर्ज किया गया, जबकि उत्तर प्रदेश के Banda में लगातार दूसरे दिन तापमान 47 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहा। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र और मध्य भारत के कई इलाकों में भी गर्म हवाओं और लू ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

क्या है सुपर अल नीनो?
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो तब होती है जब पूर्वी प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। जब समुद्र की सतह का औसत तापमान लंबे समय तक सामान्य स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा ऊपर चला जाए, तो उसे “सुपर अल नीनो” कहा जाता है। इस बार वैज्ञानिकों का अनुमान है कि समुद्र का तापमान 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है, जो 1877 के रिकॉर्ड 2.7 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक होगा।
क्यों खतरनाक माना जा रहा है यह मौसमीय बदलाव?
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, अल नीनो दुनिया भर के पवन पैटर्न और मौसम प्रणालियों को प्रभावित करता है। इसका असर भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून पर सीधा पड़ता है। मानसून कमजोर होने पर देश में वर्षा कम होती है, जिससे सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार बनने वाला सुपर अल नीनो 1877 की भयावह घटना से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। बताया जाता है कि 1877 के दौरान पड़े भीषण सूखे और मौसमीय असंतुलन के कारण दुनिया की लगभग 4 प्रतिशत आबादी प्रभावित हुई थी।
क्यों लगातार बढ़ रहा है तापमान?
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस जानलेवा गर्मी के पीछे कई वैश्विक और स्थानीय कारण जिम्मेदार हैं।
1. लंबे समय से सूखा मौसम
कई इलाकों में लंबे समय से बारिश नहीं हुई है। बादलों की कमी के कारण सूरज की किरणें सीधे धरती पर पड़ रही हैं, जिससे तापमान तेजी से बढ़ रहा है।
2. शहर बन रहे “हीट आइलैंड”
बड़े शहरों में कंक्रीट की इमारतें, वाहनों का धुआं, एयर कंडीशनर से निकलने वाली गर्म हवा और औद्योगिक गतिविधियां तापमान को और बढ़ा रही हैं। विशेषज्ञ इसे “अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट” मानते हैं, जहां शहर ग्रामीण इलाकों की तुलना में कहीं ज्यादा गर्म हो जाते हैं।

NOAA ने क्या चेतावनी दी?
National Oceanic and Atmospheric Administration (NOAA) के जलवायु पूर्वानुमान केंद्र के अनुसार मई से जुलाई 2026 के बीच अल नीनो बनने की 82 प्रतिशत संभावना है। वहीं दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना 96 प्रतिशत बताई गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि यह अनुमान सही साबित हुआ, तो दुनिया को सूखा, बाढ़, भीषण गर्मी और खाद्य संकट जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत की लगभग 70 प्रतिशत वार्षिक बारिश दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है। यदि सुपर अल नीनो मजबूत होता है, तो मानसून कमजोर पड़ सकता है। इससे देश में कुल वर्षा कम हो सकती है और खेती पर गंभीर असर पड़ सकता है। India Meteorological Department (IMD) ने अनुमान जताया है that इस बार भारत में लगभग 800 मिमी बारिश हो सकती है, जो सामान्य से कम मानी जा रही है। देश के लगभग 60 प्रतिशत किसान खरीफ फसलों के लिए मानसून पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में कमजोर मानसून कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों को प्रभावित कर सकता है।
किन राज्यों में ज्यादा खतरा?
IMD के अनुसार, उत्तर भारत, पश्चिम भारत और मध्य भारत में सूखे और भीषण गर्मी का सबसे ज्यादा खतरा रहेगा। वहीं दक्षिण भारत और पूर्वी तटीय क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ जैसी स्थितियां बन सकती हैं। Chennai जैसे शहरों में भारी बारिश और जलभराव की आशंका जताई गई है।

आर्थिक नुकसान की भी आशंका
इतिहास बताता है कि अल नीनो का असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहता। 1982-83 के अल नीनो के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग 4.1 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ था, जबकि 1997-98 के अल नीनो से करीब 5.7 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक क्षति हुई थी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस बार सुपर अल नीनो बनता है, तो ऊर्जा, कृषि, खाद्य आपूर्ति और जल संसाधनों पर भारी दबाव पड़ सकता है।
भारत इस समय भीषण गर्मी के दौर से गुजर रहा है और वैज्ञानिकों की चेतावनियों ने चिंता और बढ़ा दी है। प्रशांत महासागर में बन रहा सुपर अल नीनो आने वाले महीनों में मानसून, खेती, जल संकट और तापमान पर बड़ा असर डाल सकता है। यदि हालात गंभीर होते हैं, तो देश को सूखा, बाढ़ और आर्थिक चुनौतियों का एक साथ सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में मौसम विभाग और सरकारों के लिए समय रहते तैयारी करना बेहद जरूरी माना जा रहा है।
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